रोशन भाजनकर की कहानी सच्चे मायने में प्रेरणा है — मेहनत, लगन और सपने पूरे करने की जिद का ज़िंदा उदाहरण। दिन में रेलवे यार्ड में मजदूरी और रात में बॉडीबिल्डिंग — यह संतुलन वही कर सकता है, जिसके भीतर आग हो कुछ कर दिखाने की।

सुबह के छह बजे हैं। अमरावती के वरुडा इलाके में सूरज की पहली किरणें ज़मीन को छू रही हैं। लेकिन रोशन भाजनकर के लिए यह सुबह कोई आम सुबह नहीं है — यह उनके संघर्ष और सपने की नई शुरुआत है।

हर दिन की तरह, रोशन अपने पुराने से टिफिन को बैग में रखकर रेलवे यार्ड की ओर निकलते हैं। वहां उनका स्वागत करती हैं सैकड़ों सीमेंट, अनाज और खाद की भारी-भरकम बोरियां। रोज़ की तरह उन्हें उठाना है – एक-एक कर 700 बोरियां। गर्मी हो, बारिश हो या कड़ाके की ठंड – उनका काम नहीं रुकता।

दिहाड़ी से डाइट तक

महीने के 20 हज़ार रुपये मिलते हैं इस मेहनत के बदले। इसमें से एक हिस्सा घर चलता है – मां, भाई, पत्नी और दो बेटियों की ज़रूरतें पूरी करता है। और बाकी? बाकी उनकी डाइट के लिए जाता है – वो डाइट जो किसी महंगे सप्लीमेंट से नहीं, बल्कि घर के साधारण खाने से बनती है।

क्योंकि रोशन सिर्फ मजदूर नहीं हैं, वो एक बॉडीबिल्डर भी हैं। और एक सपना देखते हैं – नेशनल लेवल बॉडीबिल्डर बनने का सपना।

शाम को पसीना, रात को प्रेरणा

शाम होते ही जब दूसरे मजदूर दिन भर की थकान के बाद घर लौटते हैं, रोशन जिम का रुख करते हैं। थके हुए शरीर के साथ, लेकिन सपनों से भरे हुए दिल के साथ। वो डंबल उठाते हैं वैसे ही जैसे दिन में बोरियां उठाते हैं – पूरी शिद्दत और जुनून के साथ।

कोई सप्लीमेंट नहीं, कोई स्पॉन्सर नहीं। बस मेहनत है, हौसला है, और एक न झुकने वाली इच्छाशक्ति।

सोशल मीडिया पर चमकता सितारा

आज रोशन सिर्फ रेलवे यार्ड के मजदूर नहीं हैं। सोशल मीडिया पर वह एक बॉडीबिल्डिंग आइकन बन चुके हैं। उनके वीडियो लाखों लोगों को यह यकीन दिलाते हैं कि अगर मन में लगन हो, तो कोई भी मंज़िल नामुमकिन नहीं।

“सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं”

कभी-कभी उन्हें ओवरटाइम करना पड़ता है, लेकिन रोशन का जिम जाना नहीं छूटता। वे कहते हैं:

“बहाने सबके पास होते हैं, लेकिन सफलता सिर्फ उनके पास होती है जो मेहनत से डरते नहीं।”

उनकी कहानी सिर्फ बॉडीबिल्डिंग की नहीं है, बल्कि एक आम इंसान के असाधारण बनने की कहानी है।

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